Monday, August 19, 2013

पूर्णिमा है आज श्रावण मास की

 पूर्णिमा है आज श्रावण मास की,
बहन-भाई के लिए यह
है घड़ी उल्लास की.
पूर्णिमा है आज श्रावण मास की,

सजल, सुशोभित थाल लेकर
सकल बहनें हैं सुसज्जित.
मधुर-मंगल गान गाती
वसन-भूषण से अलंकृत.

कर लिए रमणीय राखी
अति-मनोरम और सुन्दर.
किलकते, हँसते, उमगते
हर्ष-अपार लिए उर-अंतर.

लेने चली है वह परीक्षा
निज भाई के विश्वास की.
पूर्णिमा है आज श्रावण मास की,

जहाँ रहें भैया हमारा
सकल भाँति फूले-फले,
यश-मर्यादा, धन-दौलत सब
रत्न अनूठे उसे मिले.

बांधकर निज बन्धु-कर में
पवित्र धागा प्यार से
उमंग में डूबी हैं बहनें
झूमती उदगार से.

आ गई बेला सुहानी
सुख-सहित मृदु-हास की.
पूर्णिमा है आज श्रावण मास की,

बिषम संकट बीच में घिर
बहन जब होती प्रकम्पित,
निज बन्धु का लेकर सहारा
कर रही खुद को सुरक्षित.

परम-पावन सूत्र का बल
है विदित संसार में.
सब परस्पर बांटते हैं
विविध खुशियाँ प्यार में.

फट पडी बदली विरह की
फूटी किरण जब आश की.
पूर्णिमा है आज श्रावण मास की,

-----------------मनोज कुमार झा "प्रलयंकर"

राखी का पावन त्यौहार

इन्तजार में बीत गया फिर
राखी का पावन त्यौहार,
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

उत्सुक होकर देखा करता
पोस्टमैन की नित दिन राह,
लिए लिफाफा आयेगा वह
और बढ़ाएगा उत्साह.

राह देखना छोड़ चुका अब,
बैठा हूँ बनकर लाचार.
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

आना-जाना तो मुश्किल है
रहता हूँ घर से अति दूर,
था विश्वास करेंगी बहनें
राखी के दिन याद जरूर.

रिश्ते सभी दूर हों जाते
जब होता अपना परिवार
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

उलझ गया हूँ मैं भी शायद
बरबस निज के घेरे में,
फर्क नहीं मालुम पड़ता अब
सोदर और चचेरे में,

दूर-दूर लगते हैं सारे
सबको पडी समय की मार.
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

तीन बड़ी बहनें हैं अपनी
नौ-नौ-बहन चचेरी,
चुपके-चुपके गुजर चुकी है
यह भी राखी मेरी.

राखी बाँध पड़ोसन ने फिर
इज्जत रख ली है इस बार.
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

मनोज कुमार झा "प्रलयंकर"

  

अहाँ किऐक नय आबई छी ओझा, लिखै छी चिट्ठी साली ओ,

 
अहाँ किऐक नय आबई छी ओझा, लिखै छी चिट्ठी साली ओ,
अहाँ बिना नय मोन लगै अछि, घर लगैत अछि खाली ओ,
 
कहने छलौं अहाँ हमरा संs
फगुआ में हम आयब,
हमरा की बुझना जाइत छल
जाकs अहाँ बिसरायब.
 
माई अहाँ लेल रोज रखै अछि, काटि दूध केर छाली ओ,
 
केहन कठोर अहाँ भs गेलौं
जा केs अपना गाम
एत अहाँ के नाम जपै छी
निस दिन आठों जाम.
 
भौंरा भागल, कली बिखरि गेल, कत पडा गेल माली ओ?
 
नय अछि एतs एको टा फोटो
देखि धरब किछु धीर,
अहाँ बिना मन खिन्न भेल अछि
भरल नयन में नीर.
 
मोन होइत अछि हमरा सदिखन, दैत रहौं बड़ गाली ओ,
 
गर्मी छुट्टी होयत जखने,
झट दs एम्हरे आयब,
हमरा सभ के दर्शन दs के
मन के किछु हरषायब  
 
स्वागत हित हम ठाढ़ भेल छी, लs के फूलक डाली ओ,
अहाँ किऐक नय आबई छी ओझा, लिखै छी चिट्ठी साली ओ,
अहाँ बिना नय मोन लगै अछि, घर लगैत अछि खाली ओ,
 
     (हमर मैथिली रचना संग्रह "खंजन" सं लेल गेल)
                            ------------ मनोज कुमार झा "प्रलयंकर"
 
 

मालिक मैं मजबूर बना हूँ.

मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
कौन सुने सुक-पिक की बोली?
कौओं की आवाज में,
 
बहुत प्रतिष्ठा तुम्हें मिली थी
बनते बड़े महान थे,
होती थी जयकार कहीं तो,
कहीं बड़े गुणगान थे,
 
अब न मधुर-सुर निकल रहा है
जीर्ण-शीर्ण इस साज में,
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
 
कलुषित आज हुआ अन्तर्मन
बाहर निर्मल वेष है,
सहकार समर्पण रहा न अब तो
सिर्फ दिखाबा शेष है,
 
भाषण अब भी खूब सुनाते
जाकर सभा समाज में,
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
 
खुद 'रघुआ' से बन 'रघुनन्दन'
फिरते देश-विदेश में,
चोर-लुटेरे नग्न नृत्य कर
खुश हैं इस परिवेश में,
 
पृथक-पृथक डफली बजती है
पृथक-पृथक अंदाज में,
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
 
साम-दाम से काम न चलता
अब तो दंड विभेद है,
क्या परिणाम हुआ करता जब
होता घाट में छेद है,
 
बहुत फर्क मालुम पड़ता है
भूतकाल और आज में
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,