मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
कौन सुने सुक-पिक की बोली?
कौओं की आवाज में,
बहुत प्रतिष्ठा तुम्हें मिली थी
बनते बड़े महान थे,
होती थी जयकार कहीं तो,
कहीं बड़े गुणगान थे,
अब न मधुर-सुर निकल रहा है
जीर्ण-शीर्ण इस साज में,
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
कलुषित आज हुआ अन्तर्मन
बाहर निर्मल वेष है,
सहकार समर्पण रहा न अब तो
सिर्फ दिखाबा शेष है,
भाषण अब भी खूब सुनाते
जाकर सभा समाज में,
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
खुद 'रघुआ' से बन 'रघुनन्दन'
फिरते देश-विदेश में,
चोर-लुटेरे नग्न नृत्य कर
खुश हैं इस परिवेश में,
पृथक-पृथक डफली बजती है
पृथक-पृथक अंदाज में,
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,
साम-दाम से काम न चलता
अब तो दंड विभेद है,
क्या परिणाम हुआ करता जब
होता घाट में छेद है,
बहुत फर्क मालुम पड़ता है
भूतकाल और आज में
मालिक मैं मजबूर बना हूँ.
तेरे जंगल राज में,

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