Monday, August 19, 2013

राखी का पावन त्यौहार

इन्तजार में बीत गया फिर
राखी का पावन त्यौहार,
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

उत्सुक होकर देखा करता
पोस्टमैन की नित दिन राह,
लिए लिफाफा आयेगा वह
और बढ़ाएगा उत्साह.

राह देखना छोड़ चुका अब,
बैठा हूँ बनकर लाचार.
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

आना-जाना तो मुश्किल है
रहता हूँ घर से अति दूर,
था विश्वास करेंगी बहनें
राखी के दिन याद जरूर.

रिश्ते सभी दूर हों जाते
जब होता अपना परिवार
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

उलझ गया हूँ मैं भी शायद
बरबस निज के घेरे में,
फर्क नहीं मालुम पड़ता अब
सोदर और चचेरे में,

दूर-दूर लगते हैं सारे
सबको पडी समय की मार.
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

तीन बड़ी बहनें हैं अपनी
नौ-नौ-बहन चचेरी,
चुपके-चुपके गुजर चुकी है
यह भी राखी मेरी.

राखी बाँध पड़ोसन ने फिर
इज्जत रख ली है इस बार.
शायद भूल गयी हैं बहनें
भाई को करना अब प्यार.

मनोज कुमार झा "प्रलयंकर"

  

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